सूक्ति त्रिवेणी (वैदिक धारा) | Sukti Triveni (Vaidik Dhara)

By: लक्ष्मीचन्द्र जैन - Laxmichandra jain
सूक्ति त्रिवेणी (वैदिक धारा) | Sukti Triveni (Vaidik Dhara) by


दो शब्द :

इस पाठ में विभिन्न धार्मिक पंथों और उनके आध्यात्मिक विचारों का अध्ययन करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेखक का मानना है कि ये पंथ केवल धार्मिकता नहीं, बल्कि संस्कृति के विभिन्न धाराएँ भी हैं। इन पंथों के दार्शनिक विचारों और उनके प्रचारकों की जीवनी का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है, ताकि हम मानवता की सेवा के उनके प्रयासों को समझ सकें। लेख में यह बताया गया है कि पंथों के कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से उपासना और हृदय की समृद्धि को व्यक्त किया है। इस अध्ययन के लिए पंथों का इतिहास और उनकी शाखाओं का ज्ञान भी आवश्यक है। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि विभिन्न पंथों के प्रचारकों ने अपने अनुभवों और मौलिक विचारों को जोड़कर अपने पंथों की जीवन दृष्टि में वृद्धि की है। भारत में सभी धर्मों का एकत्रित होना और आपस में विचारों का आदान-प्रदान इस देश की सांस्कृतिक समृद्धि का आधार है। लेखक ने भक्ति को सभी पंथों का केंद्रीय तत्व बताया और यह कहा कि भक्ति के बिना कोई भी पंथ पूर्ण नहीं हो सकता। भक्ति का सार जीवन की उपासना और आत्मर्पण में है। अंत में, लेखक ने जैन भक्ति-काव्य का महत्व बताते हुए इसे जीवन के अनुभवों और भावनाओं का सच्चा परिचायक माना। इस ग्रंथ में जैन कवियों का परिचय और उनके कार्यों का विवेचन किया गया है, जिससे पाठक जैन भक्ति-काव्य की गहराई और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझ सकें।


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