वैष्णव की फिसलन | Vaishnav Ki Phislan

By: हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
वैष्णव की फिसलन | Vaishnav Ki Phislan by


दो शब्द :

"वेष्णव की फिसलन" में हरिशंकर परसाई ने समाज में धर्म और व्यवसाय के बीच के जटिल संबंधों को व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। कहानी के केंद्र में एक वैष्णव है, जो धार्मिकता के साथ-साथ अपने व्यवसाय को भी विकसित करना चाहता है। वह भगवान विष्णु की पूजा करता है, लेकिन जब उसे अपने होटल के ग्राहकों की मांगें पूरी करनी होती हैं, तो उसे अपने धार्मिक सिद्धांतों के साथ समझौता करना पड़ता है। कहानी में वैष्णव होटल का मालिक है और वह शुद्ध शाकाहारी भोजन पर जोर देता है। लेकिन जैसे-जैसे ग्राहक बढ़ते हैं, उनकी मांगें भी बदलती हैं। ग्राहक मांसाहारी भोजन, शराब, और यहां तक कि नृत्य जैसी चीजें मांगने लगते हैं। वैष्णव धार्मिकता और व्यवसाय की इस दुविधा में फंस जाता है। वह अपने ग्राहकों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रभु से प्रार्थना करता है, और अंततः वह अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेता है। इस कहानी के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि कैसे धार्मिकता और व्यवसाय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और कैसे व्यक्ति अपने सिद्धांतों को छोड़कर व्यावसायिक लाभ की ओर बढ़ सकता है। इस प्रकार, वैष्णव की फिसलन हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि धर्म और व्यवसाय के बीच में संतुलन बनाना कितना मुश्किल है। यह व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण पाठक को न केवल हंसाता है, बल्कि गहरी सामाजिक सच्चाइयों की ओर भी इंगित करता है।


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