चिंतामणि (दूसरा भाग ) | Chintamani (part -2)

By: रामचंद्र शुक्ल - Ramchandra Shukla
चिंतामणि (दूसरा भाग ) | Chintamani  (part -2) by


दो शब्द :

इस पाठ में आचार्य रापचंद्र शुक्ल की काव्य में प्राकृतिक दृश्य, रहस्यवाद और अभिव्यंजनावाद पर विचार किया गया है। शुक्ल के निबंधों का संग्रह 'चिंतामणि' नाम से प्रकाशित हुआ है, जिसमें उनके साहित्यिक विचारों का समावेश है। पहले भाग में विभिन्न निबंध शामिल हैं, जबकि दूसरे भाग में तीन प्रमुख निबंध दिए गए हैं। प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन करते समय शुक्ल ने यह बताया है कि कविता में केवल दृश्य का अनुभव नहीं बल्कि अन्य ज्ञानेन्द्रियों का भी समावेश होना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि काव्य में प्राकृतिक दृश्य केवल नायक या नायिका की भावनाओं को उत्तेजित करने के लिए नहीं होते, बल्कि उनका अपना महत्व होता है। शुक्ल के अनुसार, काव्य में प्राकृतिक दृश्य का चित्रण करने के लिए कल्पना का उपयोग आवश्यक है। वे यह मानते हैं कि काव्य का पहला विधान 'विम्ब-प्रहण' है, जिसमें कवि के लक्ष्य का स्पष्ट होना आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि काव्य में भावों का अनुभव करने वाला व्यक्ति और भाव का विषय दोनों की भूमिका होती है। प्राचीन कवियों द्वारा प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन केवल सौंदर्य के लिए नहीं किया गया, बल्कि यह उनके अनुभव और भावनाओं का प्रतिबिम्ब होता है। वे उदाहरण देते हैं कि वाल्मीकी और कालिदास जैसे कवियों ने प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन केवल आलंबन के रूप में नहीं, बल्कि भावनाओं के गहरे अनुभव के लिए किया है। अंत में, शुक्ल ने यह सिद्ध किया है कि मनुष्य का प्राकृतिक दृश्यों के प्रति प्रेम स्वाभाविक है और यह प्रेम दो प्रकार से प्रतिष्ठित होता है: एक तो सुंदरता के अनुभव से और दूसरा साहचर्य के प्रभाव से। इस प्रकार, काव्य में प्राकृतिक दृश्यों का महत्व केवल उनकी सुंदरता में नहीं, बल्कि भावनाओं और अनुभवों में भी निहित है।


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