कपालकुंडला | Kapal Kundala

By: बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee
कपालकुंडला | Kapal Kundala by


दो शब्द :

इस पाठ में एक यात्रा के दौरान के घटनाक्रम का वर्णन किया गया है, जिसमें एक वृद्ध और एक युवक एक नाव में यात्रा कर रहे हैं। यात्रा के दौरान, एक तूफान के कारण नाविक अपने दल से बिछड़ जाते हैं और यात्री घबराते हैं। वृद्ध व्यक्ति ने नाविक से दूरी के बारे में पूछा, लेकिन युवक ने शांत रहने की सलाह दी और कहा कि जो कुछ भी भगवान के हाथ में है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। युवक ने समुद्र के दृश्य की प्रशंसा की, जबकि वृद्ध ने अपनी चिंता व्यक्त की कि वह अपने परिवार के लिए अनाज कैसे जुटाएगा। बातचीत के दौरान, युवक ने कहा कि शास्त्र के अनुसार, घर पर रहकर भी अच्छे कर्म किए जा सकते हैं। वृद्ध ने युवक से पूछा कि वह यात्रा पर क्यों आया, तो युवक ने समुद्र देखने की इच्छा व्यक्त की। तूफान के बाद, यात्रियों को यह समझ में आया कि वे एक नदी के मुहाने पर हैं, न कि महासागर में। सूरज निकलने के बाद यात्रियों ने राहत की सांस ली और नाविकों ने उन्हें किनारे लगाने की सलाह दी। किनारे पर पहुँचने के बाद, यात्रियों ने स्नान और भोजन की तैयारी करने का सोचा, लेकिन लकड़ी की कमी के कारण उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ा। नवयुवक ने लकड़ी की खोज में अकेले जाने का निर्णय लिया, लेकिन उसे लौटने में समय लग गया। इस बीच, यात्रियों ने चिंता व्यक्त की कि शायद युवक को बाघ ने खा लिया है। जब ज्वार का पानी बढ़ने लगा, तो नाविकों ने नाव को तट से दूर ले जाने की कोशिश की। इस स्थिति में, यात्रियों ने यह निर्णय लिया कि वे युवक को छोड़कर लौटने का निर्णय लेंगे। अंत में, युवक को उस घने जंगल में अकेला छोड़ दिया गया, जबकि बाकी यात्री सुरक्षित रूप से लौटने का निर्णय लेते हैं। यह कहानी साहस, चिंता और मानव संबंधों की जटिलता पर प्रकाश डालती है।


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