सत्य की खोज | Stya ki Khoj by


दो शब्द :

इस पाठ में लेखक डा. सवपन्नो राधाकृष्णन अपने जीवन के प्रारंभिक अनुभवों और विचारों को साझा करते हैं। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तिरुतणी में हुआ था, और वे धार्मिक परिवेश में पले-बढ़े। वे अपने एकान्तप्रिय स्वभाव और मननशीलता का वर्णन करते हैं, यह बताते हुए कि उन्हें बाहरी दुनिया की तुलना में आंतरिक ज्ञान और आत्मा के अस्तित्व में अधिक रुचि थी। लेखक ने अपने जीवन में किताबों के प्रति गहरी रुचि और संबंध का उल्लेख किया है। वे सामाजिक समारोहों में आनंदित नहीं होते थे और एकांत में रहना पसंद करते थे। वे अपनी भावनाओं को छिपाने वाले और संकोचशील व्यक्ति के रूप में खुद को पेश करते हैं, जबकि लोग उन्हें मिलनसार मानते हैं। गृह जीवन के संदर्भ में, लेखक ने बताया है कि एक सफल जीवन के लिए सही साथी और रुचि के अनुसार कार्य का होना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय विवाह प्रणाली के महत्व और स्त्रियों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला, यह बताते हुए कि भारतीय संस्कृति में पत्नी का आदर्श उच्च है और यह समाज में स्थायी प्रभाव छोड़ता है। लेखक ने ईसाई धर्म के प्रति अपनी भक्ति और उसके साथ भारतीय धर्म की आलोचनाओं के प्रति अपनी पीड़ा का भी उल्लेख किया है। वे भारतीय संस्कृति के प्रति गर्वित हैं और यह मानते हैं कि धार्मिकता और मानवता का आदान-प्रदान ही जीवन का सार है। इस पाठ में लेखक ने व्यक्त किया है कि जीवन में सफलता और असफलता का संबंध भाग्य और व्यक्तिगत प्रयास दोनों से होता है। उन्होंने भारतीय नारी की शक्तियों और उनके संघर्षों का भी उल्लेख किया है, यह बताते हुए कि वे अपने पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखते हुए भी आधुनिकता की ओर अग्रसर हैं। इस प्रकार, यह पाठ जीवन, धर्म, संस्कृति, और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सत्य की खोज की एक गहरी समझ प्रदान करता है।


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