खाली कुर्सी की आत्मा | Khali Kursi ki Aatma

- श्रेणी: उपन्यास / Upnyas-Novel साहित्य / Literature
- लेखक: लक्ष्मी लाल वर्मा - lakshmilal-verma
- पृष्ठ : 462
- साइज: 9 MB
- वर्ष: 1957
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दो शब्द :
यह पाठ एक कुर्सी के दृष्टिकोण से जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं का एक व्यंग्यात्मक चित्रण करता है। कुर्सी, जो एक प्रतीक के रूप में कार्य कर रही है, अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से समाज की विकृतियों, मानव के स्वार्थ, और मूल्यहीनता का उल्लेख करती है। लेखक ने कुर्सी को नीलाम होने की प्रक्रिया के माध्यम से दिखाया है कि कैसे मनुष्य की मूल्यों और धर्मों को नीलाम करके अपने स्वार्थ साधने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कुर्सी अपने रचनाकार के बारे में बात करती है, जो उसे तोड़ने और फिर उसे नीलाम करने के लिए तैयार होता है। वह लेखक की मनोविज्ञानिकता, उसकी रचनात्मकता और उसके संघर्षों का उल्लेख करती है। कुर्सी का टूटना और फिर उसकी नीलामी समाज में वस्तुओं की भौतिकता और इस तरह की वस्तुओं के प्रति लोगों की उदासीनता को दर्शाता है। पाठ में समाज के विभिन्न वर्गों का जिक्र है, जैसे लेखक, ज्योतिषी, शराबी शायर, वैज्ञानिक, और अन्य पात्र जो अपनी-अपनी समस्याओं से जूझते हैं। इन सभी पात्रों के माध्यम से कुर्सी यह समझने में सक्षम होती है कि समाज में हर चीज की कीमत लगाई जा सकती है, लेकिन आत्मा की स्वतंत्रता और मूल्य को कोई नहीं समझता। इस प्रकार, कुर्सी के अनुभवों के माध्यम से पाठ समाज की भौतिकता, मानवीय संबंधों की जटिलताओं और आत्मा की स्वतंत्रता के संघर्ष को उजागर करता है। कुर्सी के प्रति व्यक्त की गई संवेदनाएं और उसके अनुभव यह दर्शाते हैं कि भले ही उसका शरीर टूट जाए और उसकी कीमत लगाई जाए, लेकिन उसकी आत्मा हमेशा स्वतंत्र रहेगी।
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